#चाय

काव्या का सुबह का समय हर उस भारतीय माँ की तरह गुज़रता था जो किचन, बेड रूम और लिविंग रूम के बीच मैराथन करती हैं!! एक तरफ तवे पर पराठे अपने लालिमा को बढ़ा श्रृंगार कर रहे होते थे तो दूसरी तरफ़ सब्ज़ी अपनी कठोरता नमक के प्यार से उसे पिघला रही होती थी.. और उन दोनों के बीच में होता था "त्रिवेणी संगम "! जी हाँ , दूध, पानी और चाय की पत्तियों का अनूठा मेल... जिसके हर एक उबाल में एक इन्तेज़ार..इन्तेज़ार भी ऐसा जैसा कि पहली बार कोई शादी के लिए देखने आ रहा हो..। काव्या इस अनूठे मेल को बड़े धैर्य और प्यार से देखती थी...आख़िर सुबह की पहली चाय का आनंद ही कुछ और होता है।

 सुबह की इस सरगम कि लय में वो बीच में बच्चों को स्कूल के लिए उठाती, फिर किचन में अपनी चाय के रूप को निहारती... कभी-कभी उसमें अदरक की नाव और तुलसी के पतवार को भी तैरा देती। उसने बालकनी के पास एक सफेद रंग की कॉफी टेबल सज़ा रखी थी उसके संग दो सफेद चेयर ऐसी शोभा बढ़ाती थीं मानों सुकून का छोटा सा कोना जिसमें राहत के कुछ पल इन्तेज़ार कर रहे हों। बच्चों के उठने के पहले ही काव्या चाय छानकर उस टेबल पर रख देती थी..। फिर क्या स्कूल की तयारी भर में रोहन के उठने का टाइम हो ही जाता था...! काव्या की सखी(चाय)उसका वहीं मुन्तजिर बन राह देखती रहती। रोज़ाना यही सिलसिला चलता रहता..काव्या की हमेशा से इच्छा होती थी की मैं थोड़ा समय "ख़ुद " के साथ बताऊँ। ख़ुद से ख़ुद को मिलाऊँ और ख़ुद को एक प्याली चाय पिलाऊं लेकिन रोज़ की भागदौड़ में वो एक मुलाक़ात अधूरी रह जाती। 

रोहन के उठते ही ,घड़ी की सुईयां जैसे आपस में चूहे-बिल्ली का खेल शुरु कर देती थीं। उसे बेड टी पसंद है...मतलब उस टेबल की चेयर तक सुबह- सुबह जाने में उसे कोई इंट्रेस्ट नहीं।  काव्या ने बहुत बार ट्राई किया कि वो दोनों साथ में एक कप चाय पियें। लेकिन वो हसरत पूरी ना हो पाई। काव्या की जॉइंट फॅमिली थी...उसने तो बचपन से यही देखा है की एक चाय कैसे सबको जोड़े रहती है। कभी भी किसी को चाय उसके कमरे में नहीं मिलती थी,  घर का नियम था साथ में बैठना क्यूंकि चाय बन रही है। 

भारतीय घरों की खूबसूरती यही तो है..कैसे एक चाय हर किसी का साथ में सिर्फ बैठने का बहाना बन जाती है..। चाहे ऑफिस की भागमभाग के बीच मीटिंग के बहाने हो, या घर में कुछ  ज़रूरी बात करने के बहाने, कभी किसी से मिलने के बहाने, ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर या किसी को घर बुलाने के बहाने, कभी ख़ुद को जानने के बहाने..चाहे बारिश में पकौड़ीयों संग, या जाड़ों में हरी मटर के सहारे... ये चाय तो हमारी संस्कृति की पहचान बन गई है। भारत में हर दो कदम पर चाय के स्वाद के साथ-साथ उसका नाम भी बदल जाता है... मसाला चाय, अदरक चाय, इलायची चाय, कड़क चाय, तंदूरी चाय, कटिंग चाय, कश्मीरी कहवा, नून चाय, गुलाबी चाय, सुलेमानी चाय, लेमन टी, काली चाय, हरी चाय, सफेद चाय, ऊलोंग चाय, हर्बल चाय...उफ़ और जाने क्या क्या....!! लेकिन चाय चाहे जैसी भी हो उसके इन्तेज़ार और पाने का तड़प भी धैर्य रखने का अलग माप है। 

काव्या भी उसी तड़प और इंतज़ार का शिकार थी... रोहन और बच्चे एक साथ झटपट कैसे निकल जाते  थे पता ही नहीं चलता...।रह जाते तो बस काव्या और उसकी चाय..चाय को दोबारा खौला कर काव्या अपनी सफ़ेद चेयर पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ फिर उन दिनों में खो जाती जब साथ में बैठकर चाय का मज़ा लिया करते थे... उसके मन में अनगिनत प्रश्न उठते कि " चाय तो हम रोज पीते  हैं.... लेकिन,क्या सच में आज हम इतने व्यस्त हो गए हैं की अपनों के साथ एक कप चाय पीने का ना तो समय निकाल पाते हैं और ना ही कोई "बहाना"??" ... पहले की तरह  जब बातें" बनती थीं और वहीं बातें आज "यादें" बन कर काव्या के दिल के कोने में एक आस बनकर इन्तेज़ार कर रहीं हैं सिर्फ़ एक कप प्यार भरी "चाय" का या एक "बहाना" सिर्फ़ साथ बैठने का। 

-श्वेता 

Comments

  1. बहुत खूबसूरत कहानी चाय के बहाने रिश्तों की गर्माहट को बेहद खूबसूरती से बयां किया है 👌

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  2. Beautifully written as always ❣️❣️

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  3. Simple, Warm and perfect 😍 Reading this felt like that taking first morning sip😋🔆🌻

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