#नया जूता
जब नील स्कूल से घर लौटा तो उसके चेहरे पर एक मायूसी की परछाई साफ़ झलक रही थी। मानो जैसे उस से कुछ छिन्न गया हो, जैसे उसका कोई करीबी उस से बिछड़ गया हो। निराशा ऐसी जैसे 1999 के पेप्सी कप के दौरान शोएब अख्तर की घातक बॉल लगने के बाद सौरव गांगुली को अपनी 57 की पारी छोड़कर जाना पाड़ा था। नील की आँखों से आँसू ऐसे निकलते जा रहे थे जैसे गंगा जी ने ठान लिया हो कि आज तो संगम के तट पर लेटे हुए हनुमान जी को स्नान करा कर ही मानेंगी। घर की डोरबेल की तरफ़ उसनें के तेज दबाव से उसे बजाया। माँ घंटी के बजने की लय से ही भाप लेती थी की आज नील का मूड कैसा है। वो भागती हुई दरवाजा खोलने पहुंची। दरवाजा खुलते ही नील माँ से ऐसे चिपक गया...मानो जैसे माँ की साड़ी का आँचल। माँ ने उसी आँचल से अपने दुलारे का मुंह पोछा और पूछा, "क्या हुआ बेटा, इतना क्यूँ रो रहा है? रो रो कर कैसी चिलगोज़े जैसी शक्ल बना ली है? ( जैसा कि हम सब जानते हैं दुख में, पीड़ा में, क्रोध में,खुशी में माँ का प्यार इन टेढ़े मेढ़े शब्दों के बिना पूरा नहीं होता, अर्थ चाहे जो भी हो पर ये शब्द दिल को छु लेते हैं "चिलगोज़ा") नील ने धीर...






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