#स्कूटर


कुणाल को बचपन से ही स्कूटर चलाने का बहुत शौक था। पापा जब भी ऑफिस जाने के लिए स्कूटर को एक जबरदस्त किक मारकर स्टार्ट करते तो कुणाल को बॉलीवुड की फ़िल्मों के "ही-मैन" धर्मेंद्र की याद आ जाती।जो अक्सर अपनी फ़िल्मों में लैम्बरेटा पर हिरोइनों को लहराते..मेरा मतलब है अपनी जुल्फों को लहराते दिखाई पड़ते थे । संडे के दिन कुणाल पापा के साथ अपने सपनों के रथ का श्रंगार करते नज़र आता था। 

जैसे-जैसे कुणाल भैया बड़े होते गए वैसे वैसे स्कूटर को लेकर उनकी इच्छाओं के चित्र भी बदलते गए...कभी वो अपने आप को अकेले स्कूटर की सवारी करते सपनों में खो जाते..और कभी अपने दोस्तों के  संग स्कूटर से स्टंट्स करते हुए भावनाओं में बह जाते थे। कुणाल को इन्तेज़ार था तो बस सोलह का पूरा होने का... की  उन्हें RTO द्वारा लिखित तौर पर पूरा अधिकार मिल जाये पापा की बजाज चेतक चलाने का। एक ओर था महाराना प्रताप का "चेतक" जो कि फुर्तीला और चौकन्ना था..जो बादलों से बातें करता चलता था और दूसरी तरफ पापा जी की "बजाज चेतक " जो थोड़ा  बलखा- बलखा कर चलती थी...और बादलों से बातें करना तो दूर लेकिन हाँ सामने से कुछ हैंडसम सी काली बाइक आ जाये तो शर्मा शर्मा कर बंद जरूर हो जाती थी। 

लेकिन कुणाल के लिए तो वहीं सबसे खास थी... क्यूंकि उसने देखा था की पापा ने कैसे पैसे जुटाने के बाद स्कूटर ली थी... कैसे वह रोज पापा को मम्मी से कहते सुनता था कि अगर एक स्कूटर आजाये तो यह रोज़ का ऑफिस से ऑटो करके फिर घर  तक पैदल चलना खत्म हो जाये। कुणाल ने देखा था की कैसे जब स्कूटर पहली बार घर आई तो पड़ोसियो ने अपनी बालकनी और खिड़कियों पर लटक कर देखना शुरू कर दिया था। कैसे एक अंकल जी ने बधाई देते हुए कहा था,"अरे ,क्या बात है शर्मा जी नई स्कूटर, चेतक इज गुड!" और पापा जी ने सीना चौड़ा कर के अपनी खुशी दिखाते पर होंठों की हसी दबाते हुए कहा था " थैंक यू जी "। कुणाल के लिए ये लम्हे किसी भी खजाने से कम नहीं थे। मम्मी का रोली से नई स्कूटर पर स्वस्तिक बनाकर उसका स्वागत करना... और पापा का धीरे से उन्हें मुस्कुरा कर ये कहना की "एक चक्कर लगवा दूँ? " 

कितना बड़ा दिन रहा होगा ना? कैसे छोटी छोटी खुशियों हमारी जिंदगी का वो खास पल बन जाती हैं..कुणाल के  मम्मी पापा ने और हमारे मम्मी पापा ने भी ना जाने कितनी  अनगिनत इच्छाओं को मारकर एक सपने को पूरा करने में लगा दिया होगा। कैसे माँ ने दुकान पर रेखा वाली बनारसी पहनने की इच्छा दुकान की किसी कुर्सी पर यूँही छोड़ दी होगी कि पापा अपनी स्कूटर खरीद सकें और पापा ने भी शोरूम में ड़ी"LML वेस्पा" की चाह किसी टायर के नीचे दबाकर चेतक के लिए हामी भरी होगी। कुणाल तो बस वही गर्व महसूस करना चाहता था। कई बार पापा जी को बिना बताये स्कूटर चलाने पर जम कर सुताई भी हुई। लेकिन उन उंगलियों का छपना आज कुणाल को वो सारे सबक याद करा रहा है जो पापा सिखाया करते थे। आज अपने पुराने शहर में आकर उसे पापा  बहुत याद आ रहे थे। 

पापा की स्कूटर उठा कर वह उन्हीं पुरानी गलियों में  उन यादों के साथ खो जाना चाहता था। कुणाल अब एक बहुत बड़ी मल्टीनैशनल कंपनी में वी पी है .... उसके पास दो दो बड़ी गाड़ियां हैं..लेकिन आज स्कूटर पर पापा की जगह पर बैठकर उसे वो सारी जिम्मेदारियाँ जानी पहचानी सी लग रही थीं जो कभी उसके लिए महज एक ड्राइविंग सीट पर बैठने का सपना थीं। वह इन यादों की नदियों में गोते लगा ही रहा था कि तभी अचानक से पीछे से एक दुपट्टा लहराता हुआ उसके चेहरे पर आ गया। पीछे मुड़ कर देखा तो उसे एहसास हुआ कि गौरी उसकी माँ की जगह पीछे वाली सीट पर बैठी मुस्कुरा कर कह रही थी, " घर चलें....."। 

- श्वेता 

Comments

  1. Shaandar rachna....Bahut hi sunder aur gehra bhav hai ❤️💕💯💯

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  2. Such a heartwarming story full of nostalgia and emotions 👌🥰

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  3. जबर्दस्त रचना श्वेता

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    1. जबर्दस्त रचना श्वेता

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    2. Bahut sundar ……purani Yaadein Taaza Kar di 👏👏👏

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