#टेलीफोन
"टेलीफोन" हर किसी की ज़रूरत बन गया। उस समय टेलीफोन का घर में होना एक बहुत गर्व की बात होती थी.. याद है??1980 में बेनोटैक कंपनी का वो लाल रंग का लैंड लाइन कई घरों की शोभा बढ़ाता था.!! हमारे पुराने फोटो एल्बम इस बात के गवाह हैं कि इस लाल यंत्र के इर्द-गिर्द घूम कर हमनें जाने कितनी फोटो खिंचवाई हैँ। सुहानी के घर पर भी इस यंत्र का आगमन हुआ..!! उस दिन मानो घर एकदम से अपग्रेडेड लगने लगा....।। अब भई वो ज़माना ही ऐसा था जिसमें एक नयी चीज का किसी के घर आना आस-पास के घरों में चर्चा का विषय बन जाया करता था। सुहानी और आशीष के नए टेलीफोन पर भी सभी का ध्यान केंद्रित हो गया!! जैसे-जैसे फोन का तार खींचने लाइनमैन बढ़ते गए.. बालकनी में खड़ी महिलाओं का दिल उतनी ही तेजी से धड़कने लगा। खंबा थोड़ी दूर होने के कारण दो लाइनमैनों की ज़रूरत पड़ी। तार खींचते ही आशीष ने 50-50 की नोट निकाल कर दोनों को पकड़ाई..। भारत में किसी नए काम की शुरुआत हो चाहे तीज त्यौहार, मिठाई के साथ नोट लगाना आवश्यक हो जाता है।यहाँ तक कि बड़ों का आशिर्वाद भी घर के छोटों पर नोटों से ही बरसता है। हमें आज भी याद है हम सब जब भी नानी के घर जाते थे तो बहुत सारा ऐसा आशिर्वाद जेब में भर लाते थे। एक बार हमारे साथ हमारी बुआ जी के बच्चे भी नानी जी के घर पहुचे.. लौटाते वक़्त जब नानी जी सबको अपना प्यार रूपी आशीर्वाद बाट रहीं थीं..हमने उन्हीं प्यार भरी नजरों से उनकी तरफ देखा, नानी ने हमें भी एक नोट थमाया। हमने बड़ी ख़ुशी से अपनी मुट्ठी बिना देखे बंद कर ली।गाड़ी में बैठे तो पता चला कि नानी ने हमारी बुआ के बच्चों को 10 रुपये और हमें सिर्फ 5 रुपये में टाल दिया। उस दिन पहली बार हमें पता चला था कि प्यार में धोखा मिलने पर कैसे मेहसूस होता है।
खैर, बात हो रही थी सुहानी-आशीष के नए फोन की....फोन लगते ही दोनों के चेहरे पर एक अलग ही खुशी झलक रही थी...आखिर पूरी बिल्डिंग में एकलौता फोन जो लगा था। फोन लगने के तुरंत बाद कोडैक का कैमरा निकाला गया...। सुहानी और आशीष ने फोन के दायें और बाएँ खड़े होकर एक यादगार फोटो खिचाई। दोनो बच्चों की भी फोन का रिसीवर पकड़ कर ऐतिहासिक फोटो खींची गई (हम सब के घरों में ये एक फोटो जरूर होगी)। सुहानी ने माँ के बुने क्रोशै के एक छोटे कवर से उसे ढक दिया ..पहले के समय में हर एक चीज बहुत ऐतिहाद से ढकी जाती थी..। चाहे वो फ्रिज हो, टीवी हो ,वाशिंग मशीन हो, सिलाई मशीन हो, अपने संस्कार हो , अपनों की गलतियां हो, या गलतफहमियां हो, अपनी सभ्यता हो या फिर ईश्वर द्वारा बनाया गया मंदिर रूपी शरीर...। हर एक चीज कवर की जाती थी जो शायद धीरे-धीरे अब हम भूल रहें हैं ।
फोन का नंबर आया... पहली बार डायल टोन सुनने के लिए बच्चों ने बहुत बार रिसीवर उठाया और रखा। वो खनकती हुई आवाज सागर में उठती लहरों से कुछ कम नहीं था। फोन नंबर अब आस पड़ोस में भी सर्कुलेट हो गया। हर किसी ने अपने रिश्तेदारों को इस छह डिजिट के कोड से अवगत कराया। दिनभर सुहानी के घर में लोगों का हुजूम लगा रहता। बच्चे फोन बजने पर जितने जोश के साथ उसे उठाते उतने ही ठंडे स्वर में जवाब देते "शर्मा आंटी के लिए उनकी बुआ जी का है"..."विक्रम अंकल के पिता जी का है "...वगैरह -वगैरह । बच्चे सुहानी से शिकायत करते ,"माँ, हमारा फोन नहीं आता.. हम तो बस सबको बुलाते ही रहते हैं.." सुहानी कहती भी तो क्या कहती वह खुद अपनी माँ कब से बनारस ट्रंक कॉल लगाने के लिए परेशान थी ... फोन कभी खाली ही नहीं मिलता.. और फोन खाली होने पर वो समय नहीं निकाल पाती...। एक दिन आशीष से उसने चिढ़कर कहा, "जी करता है की इस फोन का तार ही काट दूँ..." आशीष उसकी झल्लाहट समझते हुए मुस्कुराया.. और सुहानी से कहा, " देखो तुम्हें खुद एक समय तय करना होगा..और आसपास सभी लोगों को प्यार से रोकना होगा ..बस फिर अपने लोगों से भी जम कर बात होगी। " सुहानी को लगा कि आशीष ने उसके चिड़चिड़ेपन का कितनी आसानी से हल निकाल दिया..! अब सुहानी अपनी माँ को हर संडे शाम कॉल लगाने लगी..।दुनिया की खुशी एक तरफ माँ से अपने दिल की बातें सीधे कहने की खुशी एक तरफ!! जो बातें उसे चिट्ठी में लिखने में उचित-अनुचित सोचना पड़ता था..अब वह माँ से बेझिझक कह डालती ।कभी हसी के ठहाके सुनाई पड़ते तो कभी आंखों से आंसू बह जाते। माँ भी संडे की शाम अपनी अच्छी कॉटन की धोती पहन, कंधा कर, हाथों में रुमाल लिए, दोनों हांथ एक के ऊपर एक रख..फोन की घंटी बजने के इन्तेज़ार में बैठ जाती। सुहानी की संडे के दिन की खुशी..उत्साह किसी उत्सव से कम नहीं लगता। आशीष चुपचाप यह दृश्य देखकर मुस्कराता..उसके लिए ये एक ट्रॉफी के समान थी। पिछले साल आशीष के पिता जी का अचानक निधन हो गया था।हार्ट अटैक आया था...जब तक आशीष को ख़बर पहुँचती बहुत देर हो चुकि थी। आखिरी बार उन्होंने आशीष को चिट्ठी में लिखा था, "बेटा, दूर जरूर हो लेकिन दूरी कभी नहीं बनाना..यही तार हम सबको हमेशा जोड़े रखेगा" उनके आखिरी शब्द आशीष के लिए उसके जीवन की सीख बन गई। आशीष दूर खंबे से जुड़ा फोन का तार बालकनी से एक टक देख रहा था।
-श्वेता



Beautifully written....It's not just writing it's emotionsss...#rooted#nostalgia...lovely dear..keep coming...❤️
ReplyDeleteअति सुन्दर👌🏼 पुरानी यादें ताज़ा कर दीं और दिल को छू गई ❤️
ReplyDeleteAmazingly expressed❤️❤️Every one has the art of writing , but the feelings in your pen belong to no one else !!❤️❤️👍✌️
ReplyDeleteBeautiful 😍
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